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जो खरा लगा, खीरी की जनता ने उसे चुना

LAKHIMPUR KHIRI

लखीमपुर-खीरी।  घाघरा से लेकर गोमती तक को चूमती लखीमपुर खीरी की धरती का जिक्र पौराणिक काल में भी मिलता है। यहां  स्थित गोला गोकर्ण को छोटी काशी कहा जाता है। जिले का दुधवा नेशनल पार्क देश के कोने-कोने में फेमस। हरियाली कर साथ गन्ने की मिठास के लिए भी ये जिला जाना जाता है। हालांकि, पिछले ढाई साल से किसान आंदोलन की वजह से भी ये जिला चर्चा में है। दरअसल 3 अक्टूबर 2021 को तिकुनिया खीरी  में आंदोलन कर रहे किसानों पर बीजेपी नेता के बेटे दावरा गाड़ी चढ़ा दी गई थी, जिसने देश में सुर्खियां बटोरी थी, लेकिन अगर बात करें यहां  की सियासत की तो उसका मिजाज स्थायी है।  यहां  की जनता उसे ही अपने नेता चुनती है, जो खरा है। आइए जानते हैं लखीमपुर खीरी का राजनीतिक इतिहास…

1957 में  पहली बार हुआ था लोकसभा चुनाव

आजादी के बाद 1957 में खीरी में पहला लोकसभा चुनाव हुआ। जे.बी. कांग्रेस से अलग हुए कृपलानी, नरेंद्र देव जयप्रकाश नारायण और अन्य लोगों ने मिलकर प्रजा सोशलिस्ट पार्टी बनाई। पार्टी ने देश भर में 19 सीटें जीतीं, जिनमें से एक खीरी भी थी। हालांकि खीरी कांग्रेस की लहर में बहने से खुद को ज्यादा देर तक नहीं रोक सकी और 1962 से 1971 तक कांग्रेस के बाल गोविंद वर्मा इस सीट से लगातार जीते और हैट्रिक बनाई। फिर आया 1977 का दौर, जब  जनता पार्टी के सूरत बहादुर शाह ने कांग्रेस के खिलाफ अभियान जीता और इस सीट पर जीत दर्ज की। 1980 में हुए आम चुनाव में बाल गोविंद ने एक और संसदीय सीट जीती और चौथे कार्यकाल के लिए चुने गए, लेकिन उनकी चुनावी जीत के कुछ महीने बाद उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद हुए उप चुनाव में उनकी पत्नी उषा वर्मा जीत हासिल की।

 90 के दशक में पहली बार खिला था कमल 

इसके साथ ही राजनीतिक क्षेत्र में यह विरासत और भी मजबूत हो गई, फिर 1984 और 1989 में उषा ने कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की और 1990 के दशक में गेंदालाल कनौजिया ने मंडल कमंडल की जगह खीरी में पहली बार कमल खिलाया। 1996 में जनता ने बीजेपी को दोबारा मौका दिया।  कमंडल के बाद एक बार फिर से बारी आई ‘मंडल’ की, जिसकी स्थापना 1992 में सपा ने की थी। 1991 में कांग्रेस छोड़ने के बाद उषा भी  समाजवादी पार्टी का हिस्सा बन गई और वह चौथी बार 1996 में से केवल 5,444 वोटों से चुनाव हार गई थी। 1998 में सपा ने उषा के बेटे रवि प्रकाश वर्मा पर भरोसा जताया। रवि ने भी अपने माता-पिता की तरह जीत की हैट्रिक बनाई। हालांकि 1999 के चुनाव ने प्रतिद्वंदी से रवि महज  4,500 वोटों के अंतर से  जीते थे। इसके बाद 2004 में बीजेपी ने हिंदुत्व और सामाजिक समानता के लिए विनय कटिहार को यहां से भेजा, लेकिन वे जनता के बीच अपनी जगह नहीं बना ओए और तीसरे स्थान पर रहे।

जब्त हो गई थी सभी प्रत्याशियों की जमानत 

खीरी में जनता ने 20 साल बाद कांग्रेस को दोबारा मौका दिया। 2009 में यहां  चौतरफा मुकाबला देखने को मिला। दिलचस्प बात ये रही कि यहां एक भी उम्मीदवार अपनी जमानत  नहीं बचा सका।  कांग्रेस के जफर अली नकवी को सबसे ज्यादा महज 14.26 फीसदी वोट मिले और वे सांसद बने। चूंकि वह जीत गए इसलिए उसकी जमानत बच गई। शेष उम्मीदवारों को 11% से 14% के बीच वोट मिले, जिससे उनकी जमानत जब्त हो गई। हालांकि इस चुनाव के बाद खीरी ने लड़ाई से दूरी बना ली। दूसरे, 2009 के बाद, लगभग चार दशकों में खीरी जी जनता से जिस वर्मा परिवार को  10 बार  संसद में भेजा, उसे सदन में एंट्री नहीं मिली। 2014 में रवि प्रकाश दूसरी बार हारे। 2019 में इस राजनीतिक परिवार से एक और शख्स ने राजनीति में एंट्री की। वह हैं रवि की बेटी पूर्वी वर्मा। पूर्वी सपा-बसपा गठबंधन से  खीरी की उम्मीदवार बनी,  लेकिन वह जनता का भरोसा नहीं जीत सकीं। 2009 में तीसरे स्थान पर रहे अजय कुमार मिश्रा टेनी ने 2014 में 1.10 लाख वोटों से जीत हासिल की। 1999 में जब सपा और बसपा का विलय हुआ तो टेनी की बढ़त दोगुनी (2.18 लाख वोट) हो गई। हालांकि वोट शेयर के मामले में यहां सबसे बड़ी जीत का रिकॉर्ड उषा वर्मा के नाम है। 1984 में उन्हें 72% वोट मिले। हालाँकि, बसपा के पास अब तक यह सीट जीतने की कोई संभावना नहीं थी। वह 2004 में 12,000 वोटों के मामूली अंतर से पीछे थी।

नहीं बदले खीरी के नियम 

अजय मिश्र टेनी को दूसरी जीत मिली जुलाई 2021 में। इस जीत के साथ ही उन्हें मोदी की कैबिनेट में जगह भी दी गई। वह राज्य मंत्री के रूप में नियुक्त हुए। मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के बमुश्किल तीन महीने ही पूरे हुए थे  कि खीरी क्षेत्र के निघासन विधानसभा क्षेत्र के तिकुनिया में एक घटना ने पूरे देश की राजनीति को गर्मा दिया है। उस वक्त दिल्ली में कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे थे। तिकुनिया में भी किसानों के समर्थन में प्रदर्शन गो रहा था,  तभी अजय मिश्र टेनी  के बेटे आशीष मिश्रा की कार से एक किसान की मौत हो गई थी। इसके बाद यहां  हिंसा भड़क गई। इस हिंसा में कुल आठ लोगों को जान गंवानी पड़ी।  इस घटना के बाद तिकुनिया किसान संगठनों से लेकर विपक्षियों का एक मजूबत केंद्र बना गया।  हालांकि खीरी की राजनीतिक प्रकृति नहीं बदली क्योंकि राज्य में 2022 में विधानसभा चुनाव  हुए और भाजपा ने इस क्षेत्र में आठ सीटों पर जीत दर्ज की, जिनमें खीरी लोकसभा के सभी पांच विधानसभा क्षेत्र भी शामिल हैं।  बीजेपी ने निघासन सीट से अपनी सबसे बड़ी जीत हासिल की।

हैट्रिक रोकने की लड़ाई

खीरी की पांचों विधानसभा सीटों पलिया , लखीमपुर, निर्घासन, गोला गोकर्णनाथ और श्रीनगर ( एसी ) पर भाजपा का कब्जा है। जिले के सामाजिक समीकरण पर गौर करें तो  ब्राह्मण , दलित और कुर्मी वोटर यहां राजनीति की दिशा और दशा तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। जिले में 3 लाख के करीब मुस्लिम वोटर भी हैं। पलिया में सिखों की भी अच्छी खासी आबादी है। इस समय ब्लॉक ,जिला पंचायत से लेकर जिले की हर अहम कुर्सी पर भाजपा का कब्जा है । हालांकि जिले की जनता की उम्मीदों को डोर रामलहर और मोदी की गारंटी से ही जुड़ी है। विपक्षी गठबंधन में यह सीट सपा के खाते में है जिसने कुर्मी बिरादरी से उत्कर्ष वर्मा को टिकट देकर जातीय समीकरण साधने की कोशिश की गई है। सपा छोड़कर कांग्रेस में गए रवि वर्मा अपने बेटी पूर्वी के लिए टिकट मांग रहे थे, लेकिन सपा ने सीट नहीं छोड़ी अब अगर उनका परिवार मैदान में नहीं उतरता है, तो 43 साल में पहली बार ऐसा होगा जब ये परिवार चुनावी लड़ाई से बाहर रहेगा। बसपा को अभी तक इस सीट से अपना चेहरा नहीं मिला है।

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