Follow us

एनडीए में जयंत चौधरी क्या जाट व किसान वोटों की गारंटी लेकर आए हैं!

जयंत चौधरी
  • सांप्रदायिक शक्तियों से लड़ने की खाई थी कसम? 

राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष जयंत चौधरी ने कुछ समय पहले ही एनडीए ज्वाइन कर लिया था। इसके बाद से अटकलें लगाई जाने लगी कि  वह जाट-किसानों के वोटों को पार्टी के  पक्ष में करने का वादा लेकर आए हैं। अब इस बात में कितनी सच्चाई है ये तो वहीं जानें, लेकिन कहा जा रहा है कि  जयंत के एनडीए में शामिल होने पश्चिम में राजनीतिक समीकरण जरूर बदल गए हैं।  आइए जानते हैं पश्चिम के सियासी समीकरण और जयंत की जाट व किसानों के प्रति निष्ठा बदलने की वजह।

जयंत चौधरी और उनकी पार्टी राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) एनडीए में शामिल हो गए हैं। हाल ही में केंद्र सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न से सम्मानित का ऐलान किया था। इसके बाद ही जयंत ने एनडीए में शामिल होने का निर्णय लिया। चौधरी चरण सिंह को भारत देने की घोषणा के बाद उनके पोते जयंत चौधरी ने एक पंक्ति लिखी: “दिल जीत लिया”। फिर वह बीजेपी में शामिल हो गए। बता दें कि ये वही जयंत चौधरी हैं जिन्होंने एक हफ्ते पहले पश्चिमी यूपी के एक गांव में कम्युनिस्ट ताकतों के खिलाफ लड़ने की कसम खाई थी, लेकिन ऐसा क्या हुआ कि जयंत की विचारधाराएं और निष्ठाएं रातों-रात बदल गईं। सवाल ये भी है कि जयंत चौधरी की पार्टी आरएलडी को एनडीए में शामिल होने में इतना वक्त क्यों लगा? भाजपा ने उन्हें इतने लंबे समय तक इंतजार क्यों कराया? जयंत के भाजपा में शामिल होने के बाद, पश्चिमी यूपी के किसान, जो बड़े पैमाने पर जाट हैं, को भी ये गठबंधन पसंद आएगा या नहीं? ये सभी सवाल हैं जो जयंत चौधरी के बदलने के बाद उठ रहे हैं।

भाजपा ने दो मार्च को लोकसभा चुनाव के लिए 195 उम्मीदवारों की अपनी पहली सूची जारी की थी। उसी दिन बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए में जयंत चौधरी को इस क्लब में भी जगह दे दी गई।  बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा, ”अमित शाह की मौजूदगी में मैंने आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी से मुलाकात की, मैं एनडीए परिवार में शामिल होने के उनके फैसले की तहे दिल से सराहना करता हूं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आप विकसित भारत और उत्तर प्रदेश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देंगे। इस बार एनडीए 400 पार’

आपको बता दें कि  एनडीए में शामिल होने से पहले आरएलडी इंडिया गठबंधन का हिस्सा थी। पार्टी दिसंबर से ही  पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पांच सीटों बागपत, मथुरा, मुजफ्फरनगर, मेरठ और गाजियाबाद पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही थी।   इंडिया गठबंधन के तहत, अखिलेश यादव उन्हें एसपी कोटे से पांच से सात सीटें देने पर सहमत भी हो गए थे, लेकिन जयंत एनडीए में शामिल हो गए हैं। ऐसे में पश्चिम में अब सियासी समीकरण भी बदल गए हैं। बीजेपी ने एनडीए गठबंधन से आरएलडी को दो सीटें ही दी है और जयंत चौधरी इससे सहमत भी हैं। हालांकि संभव है कि बीजेपी इस बार सीटों की संख्या को लेकर जिस तरह सेआक्रामक है वह आरएलडी को चार सीटें भी दे सकती है। रालोद के लिए सुरक्षित मानी जाने वाली एकमात्र सीट बागपत है। वहां से जयंत चौधरी खुद चुनाव लड़ सकते हैं।

‘2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, जाट एक कृषि समुदाय हैं, जो उत्तर प्रदेश की 200 मिलियन आबादी का महज 2% है। उनकी आबादी राज्य के पश्चिमी भाग में गन्ना क्षेत्रों में बिखरी हुई है। उनकी जनसंख्या और प्रमुख सामाजिक स्थिति का पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनाव के नतीजों पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। पश्चिमी यूपी का ये पैटर्न प्रदेश के अन्य हिस्सों पर असर नहीं डालता है।’
जाटों का समर्थन क्षेत्र में चुनावी राजनीति को कैसे प्रभावित कर सकता है इसका एक उदाहरण उत्तर प्रदेश में भाजपा के बढ़ते प्रभाव के रूप में देखा जा सकता है। 2009 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आठ में से केवल तीन सीटें, मेरठ, गाजियाबाद और आगरा ही मिली थीं। वहीं आरएलडी ने पांच सीटें जीतीं थी। इसमें बागपत, बिजनौर, मथुरा, हाथरस और अमरोहा है। इसके बाद  2014 और 2019 में बीजेपी ने  इस क्षेत्र में जीत हासिल की।  वहीं आरएलडी के खाते में एक भी सीट नहीं गई। 2019 में अमरोहा सीट बसपा के हिस्से में गई। इन तथ्यों से साफ है कि आरएलडी 2009 जैसा अच्छा प्रदर्शन दोबारा से नहीं कर सकी, लेकिन मौजूदा समय में जिस तरह से किसान और जाट भाजपा से नाराज हैं, उसे देखकर लग रहा है कि भाजपा को मुजफ्फर नगर दंगे के बाद मिली बढ़त इस बार प्रभावित कर सकती है।

‘नवंबर 2021 में नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा तीन विवादास्पद कानूनों को वापस लेने से पहले एक साल से अधिक समय तक दिल्ली की सीमाओं पर चले आंदोलन में पश्चिमी राज्य उत्तर प्रदेश के हजारों किसानों ने भी हिस्सा लिया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों का मानना ​​​​है कि मोदी सरकार की रियायतें किसानों के लिए पर्याप्त नहीं हैं, उनके हालात नहीं बदल रहे हैं, चूंकि पिछले किसान आंदोलन में किसानों के साथ खड़े आरएलड़ी प्रमुख जयंत चौधरी ने पुलिस की लाठियां  खाई थी और हिरासत में भी लिए गए थे, इसलिए किसान उन्हें अपना हितैषी मानते हैं, लेकिन अब हितैषी बीजेपी और एनडीए के लिए काम कर रहे हैं, इसलिए किसान दुविधा में हैं। अब किसानों और जाटों के सामने सवाल यह है कि क्या उन्हें जयंत का समर्थन करना चाहिए और बीजेपी को वोट देना चाहिए या फिर भारतीय कांग्रेस-सपा गठबंधन की पार्टियों को वोट देना चाहिए।’

दरअसल, पश्चिमी में जाट ही किसान हैं। फरवरी के अंतिम सप्ताह में सिसौली में हुई किसान पंचायत में सरकार विरोधी रवैया स्पष्ट दिखाई दिया। इसके बाद पश्चिमी यूपी के किसान नेता राकेश टिकैत-नरेश टिकैत के नेतृत्व में भी ट्रैक्टर रैली निकाली गई, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। हालांकि टिकैत बंधुओं के मन में विपक्ष और किसान संगठनों की एकजुटता पर लंबे समय से अविश्वास रहा है। ऐसे में अब देखने वाली बात यह होगी कि क्या पश्चिमी यूपी के किसान इन सब जालों से बाहर आकर अपने स्वतंत्र मत के मुताबिक वोट करेंगे।

‘देश की नामी महिला पहलवानों ने जब भाजपा सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह के कथित यौन उत्पीड़न के खिलाफ मोर्चा खोला तो उन महिला पहलवानों के साथ सबसे पहले हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी यूपी के जाट और किसान खड़े हुए क्योंकि आंदोलन करने वाली महिला पहलवान जाट थीं। बाद में पहलवान जब अपने मेडल विसर्जित करने हरिद्वार पहुंचे तो नरेश टिकैत ने उन्हें ऐसा करने से रोका। खुद जयंत चौधरी ने महिला पहलवानों के प्रदर्शन स्थल जंतर मंतर पर पहुंचकर उन्हें समर्थन दिया।’

महिला पहलवानों में आज भी सरकार के पार्टी असंतोष है। वहीं बृज भूषण शरण सिंह का दबदबा पार्टी और सरकार में बरकरार है। फिलहाल मामला कोर्ट में है, जो लंबे समय तक चलने वाला है। कुछ ही दिनों में होने वाले 2024 के लोकसभा चुनाव यह भी तय करेंगे कि महिला पहलवानों का मुद्दा पश्चिमी यूपी के जाट मतदाताओं और किसानों को किसी हद तक प्रभावित कर सकता है या नहीं। क्या एक महिला पहलवान पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चुनाव में जाकर जाटों की अंतरात्मा को झकझोरने का दम रखती है? यह सिर्फ पश्चिमी यूपी के बारे में नहीं है बल्कि हरियाणा और राजस्थान के जाटों की अंतरात्मा को चुनौती देने के बारे में भी है, लेकिन इसका जवाब समय आने पर दिया जाएगा।

पिछले दशक में, भाजपा जाट समुदाय को पार्टी में महत्वपूर्ण नेतृत्व के रूप में विकसित करने में विफल रही है। साहिब सिंह वर्मा एक समय बीजेपी का जाट चेहरा थे लेकिन उनके निधन के बाद न तो उनके बेटे प्रवेश वर्मा और न ही कोई अन्य नेता उनकी सीट भर सका। हालांकि कोशिश की गई लेकिन सफलता नहीं मिली।  ऐसे में बीजेपी अब जाट नेता के तौर पर जयंत चौधरी को पसंद करती है और उनकी छवि का फायदा उठाना चाहती है, लेकिन क्या पश्चिमी यूपी में जाट जनजातियां और किसान बीजेपी को जयंत चौधरी के प्रदर्शन का फायदा उठाने की इजाजत देंगे? ऐसा इसलिए है क्योंकि जाट जनजातियों और किसानों को इस सरकार से कई शिकायतें हैं।

इसे भी पढ़ें- NDA में शामिल हुए जयंत चौधरी, बिजनौर और बागपत सीट आई हिस्से में

इसे भी पढ़ें-उत्तर प्रदेश सियासत: सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ मंच साझा कर सकते हैं जयंत चौधरी

nyaay24news
Author: nyaay24news

disclaimer

– न्याय 24 न्यूज़ तक अपनी बात, खबर, सूचनाएं, किसी खबर पर अपना पक्ष, लीगल नोटिस इस मेल के जरिए पहुंचाएं। nyaaynews24@gmail.com

– न्याय 24 न्यूज़ पिछले 2 साल से भरोसे का नाम है। अगर खबर भेजने वाले अपने नाम पहचान को गोपनीय रखने का अनुरोध करते हैं तो उनकी निजता की रक्षा हर हाल में की जाती है और उनके भरोसे को कायम रखा जाता है।

– न्याय 24 न्यूज़ की तरफ से किसी जिले में किसी भी व्यक्ति को नियुक्त नहीं किया गया है। कुछ एक जगहों पर अपवाद को छोड़कर, इसलिए अगर कोई खुद को न्याय 24 से जुड़ा हुआ बताता है तो उसके दावे को संदिग्ध मानें और पुष्टि के लिए न्याय 24 को मेल भेजकर पूछ लें।

Leave a Comment

RELATED LATEST NEWS