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हमेशा बदलती रही है बहराइच की सियासी हवा, अभी तक कोई भी पार्टी नहीं लगा सकी है जीत की हैट्रिक

बहराइच
उत्तर  प्रदेश की बहराइच लोकसभा सीट पर सियासी बयार हमेशा बदलती रही है। यहां की जनता ने कभी किसी एक नेता पर भरोसा नहीं जताया। यहां से कभी कोई संसद पहुंचा तो कभी कोई।  शायद यही वजह रही कि ये सीट किसी पार्टी या किसी नेता का गढ़ नहीं बन सकी। और तो और यहां से कोई भी नेता अभी तक जीत की हैट्रिक नहीं लगा सका है। हालांकि इस बार बीजेपी हैट्रिक लगाने के मूड में है और इसके लिए वह कमर कस चुकी है। अब देखना ये है कि वह अपने मकसद में कितना सफल हो पाती। अगर बीजेपी सफल हो गई तो इतिहास रचेगा, नहीं तो पुरानी स्थिति बरकर रहेगी।

बहराइच। उत्तर प्रदेश की बहराइच की धरती पर जन्मे शायर मोहसिन जैदी का एक शेर है-‘जहां पे देखे कदम अपने कुछ भटकते हुए, वहीं ठहर के फरोजा चराग-ए-बादा किया।’ इस शेर का मतलब ये है कि जब भी भटकाव की स्थिति आई तो ठहरकर आत्म मूल्यांकन किया। कुछ ऐसा  ही सियासी मिजाज बहराइच की जनता का भी। यहां की जनता कभी किसी सियासी लहर में नहीं बही। जो पार्टी और प्रत्याशी समझ में आया उसे हो वोट दिया और नहीं समझ में आया तो थोड़ा ठहर कर सोचा और फिर बदल दिया। वैसे तो बहराइच से स्थानीय लोग भी जीते और बाहरी आए तो उन्हें भी यहां की जनता से सिर आंखों पर बैठाया और संसद भेजा। बहराइच लोकसभा सीट पर कांग्रेस छह बार और भाजपा पांच बार जीत दर्ज चुकी है लेकिन अभी तक किसी भी पार्टी या प्रत्याशी ने हैट्रिक नहीं लगाई है। हालांकि इस बार भाजपा की कोशिश है कि वह रिकॉर्ड तोड़े और हैट्रिक लगाए। साथ ही कांग्रेस के छह बार जीतने के रिकॉर्ड की भी बराबरी कर सके।

दो चुनाव के बाद हार गई कांग्रेस 

अब तक हुए लोकसभा चुनाव पर गौर करें तो आजादी से पहले ही स्वतंत्रता आंदोलन और राजनीति में सक्रिय रहे रफी अहमद किदवई ने बहराइच में 1952 में हुए पहले चुनाव में जीत दर्ज की। जब पूरा देश अन्न के संकट से गुजर रहा था तब रफी अहमद किदवई खाद्य मंत्री बने। उस समय माना जा रहा था कि यह विभाग उनके लिए मुश्किल पैदा करेगा  लेकिन उन्होंने अपने फैसलों से काफी प्रशंसा हासिल की। उन्होंने जमाखोरों के द्वारा खड़े किए गए अन्न  के संकट को खत्म करने का काम किया और अनाज को नियंत्रण मुक्त कर दिया। इसके बाद 1957 में हुए दूसरे आ चुनाव में कांग्रेस के  सरदार जोगिंदर सिंह  ने जीत हासिल की और संसद पहुंचे। रफी अहमद किदवई की तरह सरदार जोगिंदर सिंह भी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और बहराइच के ही रहने वाले थे।  दो चुनाव के बाद 1962 में हुए तीसरे चुनाव में कांग्रेस हार गई। इस चुनाव में चक्रवर्ती राज गोपालाचारी की बनाई गई स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे कुंवर राम सिंह ने जीत हासिल की।

जनसंघ ने उतारा प्रत्याशी

इसके बाद 1967 में अगला चुनाव हुआ तो यहां से जनसंघ के प्रत्याशी केके नायर जीते। वह पहले प्रशासनिक अधिकारी थे, लेकिन बाद में जनसंघ में शामिल हो गए।  1971 में एक बार फिर से कांग्रेस ने वापसी की और बदलू राम शुक्ला यहां से संसद पहुंचे। इमरजेंसी के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी के ओम प्रकाश त्यागी यहां से सांसद चुने गए। इसके  बाद 1980 में हुए आम चुनाव में जनता ने एक बार फिर से कांग्रेस पर भरोसा जताया और सैय्यद मुजफ्फर हुसैन को संसद पहुंचाया। यहां से 1984 में भी कांग्रेस ने जीत हासिल की लेकिन सांसद का चेहरा बदल गया। 1984 में यहां से आरिफ मोहम्मद खान चुनाव जीते। आरिफ 1989 में भी इसी सीट से संसद पहुंचे लेकिन इस बार वह जनता दल के टिकट से चुनाव लड़े थे और जीते थे।

1991 में  भाजपा को मिली जीत

राम मंदिर आंदोलन की लहर में पहली बार यहां की जनता से भाजपा प्रत्याशी पर भरोसा जताया और जिले का प्रतिनिधित्व उसे सौंप दिया। 1991 में हुए आम चुनाव में बीजेपी के टिकट से बहराइच  के चुनाव मैदान में उतरे रुद्रसेन चौधरी को जीत मिली। इसके बाद 1996 में भी भाजपा जीती लेकिन सांसद पद्मसेन चौधरी बने। इसके बाद इस सीट पर बसपा और सपा ने भी एंट्री मारी और अपने-अपने प्रत्याशी उतरे। यहां हुए 1998 के आम चुनाव में बसपा से आरिफ मोहम्मद खान लड़े और जीते। इसके ठीक एक साल बाद 1999 में फिर से चुनाव हुआ, जिसमें भाजपा के पद्मसेन चौधरी ने जीत दर्ज की। 2004 के लोकसभा चुनाव में सपा ने इस सीट से मुस्लिम कार्ड खेला और वकार अहमद शाह की पत्नी रुआब सईदा को टिकट दिया। जनता ने भी रुआब सईदा को जिताकर संसद भेज।  2009 में इस सीट से कांग्रेस के कमल किशोर ने जीत दर्ज की। उसके बाद 2014 के चुनाव में सावित्री बाई फुले भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ीं और जीतीं लेकिन 2019 के चुनाव से पहले उन्होंने भाजपा से बगावत कर दी और कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ीं लेकिन कोई खास असर नहीं दिखा। यहां से भाजपा के अक्षयवर लाल सांसद बन गए।

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अलग-अलग जातियों में बंटे हैं लोग

बहराइच की करीब एक तिहाई आबादी मुस्लिम की है। यही कारण रहा कि यहां से छह बार मुस्लिम प्रत्याशी सांसद बन चुके हैं। वहीं यहां हिंदुओं की मिली-जुली आबादी है। यहां सवर्ण, ओबीसी और एससी-एसटी की आबादी लगभग बराबर है लेकिन ये भी अलग-अलग जातियों में बंटे हैं।  ऐसे में यहां जातीय समीकरण साधना आसान नहीं है क्योंकि यहां किसी एक जाति का खासा वर्चस्व नहीं है।

बीजेपी ने सांसद पुत्र को दिया टिकट

2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने बहराइच से अपने वर्तमान सांसद अक्षयवर लाल गोंड के पुत्र आनंद गोंड को उम्मीदवार बनाया है। वहीं सपा ने अपने पुराने प्रत्याशी रमेश गौतम को टिकट दिया है। रमेश गौतम बसपा में भी रह चुके हैं। वह 2007 में बसपा से विधायक थे। इसके बाद दो बार वह चुनाव हार चुके हैं। वहीं बसपा ने अभी इस सीट पर अपना प्रत्याशी नहीं उतारा है।

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