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यूपी लोकसभा चुनाव: चूर हुआ बाहुबलियों का दंभ

चुनाव

लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब बदलाव देखने को मिल रहा है। एक समय था जब यहां के चुनावों में ताकतवर लोगों का दबदबा हुआ करता था। यह पहला चुनाव है जिसमें मतदान चौथे चरण में पहुंच गया है, लेकिन इस चरण में भी कोई मजबूत नेता चुनाव मैदान में नहीं है। हालांकि हर चरण में औसतन 28 फीसदी दागी उम्मीदवार मैदान में हैं, लेकिन बाहुबली एक भी नहीं है। अगले तीन चरणों में भी ताकतवर लोग मैदान में नहीं नजर आ रहे हैं।

अभी तक चर्चा थी कि इस बार के चुनाव में डीपी यादव मैदान में नजर आ सकते हैं। वेस्ट यूपी से खुद यादव व उनके परिवार का कोई सदस्य बदायूं से चुनाव मैदान में उत्तर सकता है लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इधर, बुलन्दशहर के नेता गुड्डु पंडित और उनके भाई भी इस बार चुनाव में नहीं नजर आ रहे हैं। दरअसल, 2019 के चुनाव में फ़तेहपुर सीकरी सीट पर गुड्डु पंडित की जमानत जब्त हो गई थी। इस सबंध में उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी का कहना कि दशकों बाद प्रदेश के लिए यह सुखद अनुभव है कि बाहुबली यूपी के चुनावी मैदान से लगभग गायब हो गए हैं क्योंकि इस बार उन्हें किसी का समर्थन नहीं मिल रहा है। ये भी कहा जा रहा है कि बाहुबलियों को उनकी इस गुस्ताखी के गंभीर परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं। शिक्षित और युवा मतदाताओं की संख्या बढ़ने से उनकी मांग में भी कमी आई है।

अफजाल की उम्मीदवारी भी खतरे में 

माफिया मुख्तार अंसारी के बड़े भाई और सांसद अफजाल अंसारी गाजीपुर सीट से सपा के टिकट पर चुनाव मैदान में हैं, लेकिन उनकी उम्मीदवारी पर भी संदेह है। दरअसल, गैंगस्टर कोर्ट ने उन्हें चार साल जेल की सजा सुनाई थी, जिसके खिलाफ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। इस मामले में अगर सुप्रीम कोर्ट उनकी सजा बरकरार रखता है तो वह चुनाव में हिस्सा नहीं ले सकेंगे और उनकी उम्मीदवारी खतरे में पड़ जाएगी। इसी को ध्यान में रखते हुए उनकी बेटी नुसरत के नामांकन के लिए भी कागजात खरीदे गए है। हरि शंकर तिवारी के बड़े बेटे भीष्म शंकर तिवारी को भी चुनाव मैदान में उतारा गया है। हरिशंकर के निधन के बाद उनके परिवार के लिए यह पहला चुनाव है। अब यह देखने वाला होगा कि पिता के जाने के बाद परिवार की राजनैतिक जमीन कितनी मजबूत और सुरक्षित है। इधर बाहुबली अतीक अहमद की मौत के बाद उसके परिवार से किसी भी सदस्य ने किसी भी पार्टी से टिकट के लिए दावेदारी नहीं ठोंकी। इसी तरह संजीव माहेश्वरी उर्फ जीवा के मारे जाने के बाद से उसकी पत्नी फरार है। जीवा के परिवार से भी को चुनाव मैदान में नहीं है।

धनंजय सिंह ने वापस लिया पत्नी का टिकट 

अपहरण व रंगदारी के मामले में सजायाफ्ता पूर्वांचल के बाहुबली धनंजय सिंह ने जेल जाने के बावजूद चुनाव में दमखम दिखाने की पूरी कोशिश की। उनकी पत्नी श्रीकला को बसपा के टिकट से मैदान में भी उतार दिया लेकिन बाद में पार्टी ने प्रत्याशी बदल दिया। बताया जा रहा है कि धनंजय को कुछ वजहों के चलते पत्नी का नाम वापस लेना पड़ा।

बृजभूषण शरण सिंह भी मैदान से बाहर 

ऐसा ही कुछ गोंडा के दिग्गज और बाहुबली सांसद बृजभूषण शरण सिंह के साथ भी देखने को मिल रहा है। महिला पहलवानों के यौन शोषण के आरोपों से घिरे बृजभूषण के टिकट पर भाजपा में लंबी खीचतान के बाद उनका टिकट काट दिया गया। हालांकि उनकी सिफारिश पर उनके बेटे करण भूषण को पार्टी ने टिकट दिया है।

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