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भाजपा के लिए चुनौती बने युवा उम्मीदवार, दे रहे कड़ी टक्कर

Lok Sabha Elections
  • जनता को लुभा रहा जन संपर्क का तरीका 

  • युवाओं को प्रभावित कर रहे युवा प्रत्याशी

  • बेरोज़गारी और महंगाई का मुद्दा बन रहा चुनौती 

लखनऊ। लोकसभा चुनाव के आखिरी तीन चरणों में कई सीटों पर युवा मतदाताओं में नए उम्मीदवारों को लेकर ख़ासा उत्साह है, जो बीजेपी के लिए चुनौती बना हुआ है। यह समस्या विशेष रूप से आरक्षित सीटों पर देखी जा रही है। पहली बार चुनाव मैदान में उतरे इंजीनियरिंग एमबीए पृष्ठभूमि के इन प्रत्याशियों का युवा वर्ग पर खासा प्रभाव देखने को मिल रहा है। हालांकि इनसे निपटने के लिए भाजपा ने भी युवा और बोलने में माहिर नेताओं को चुनाव प्रचार के लिए उतारा है। पिछले दो चुनावों में प्रदेश की सुरक्षित सभी 17 सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन शानदार रहा है। चुनावी आंकड़ों पर गौर करें तो 2014 में भाजपा ने सभी 17 सीटें जीती थी जबकि 2019 में 15 सीटें जीती थी लेकिन इस बार कई सीटों पर चुनौती है।

मछलीशहर

मछली शहर लोकसभा सीट पर बीजेपी ने पिछले चुनाव में मात्र 181 वोटो से जीत दर्ज करने वाले बीपी सरोज पर भरोसा जताया है जबकि, सपा ने तीन बार के सांसद रहे दिग्गज तूफानी सरोज की बेटी प्रिया सरोज पर दांव लगाया है। इस चुनाव से राजनीतिक पारी की शुरुआत करने वाली प्रिया दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं और सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रही हैं। प्रिया अपने पिता तूफानी सरोज के चुनाव प्रबन्धन की जिम्मेदारी भी संभाल चुकी हैं।

बाराबंकी

बीजेपी ने इस सीट से पुरानी नेता राजरानी रावत को बाहर कर दिया है, जबकि इंडियन अलायंस से आईआईटी रूड़की से बीटेक तनुज पुनिया मैदान में हैं। तनुज पूर्व नौकरशाह और पूर्व सांसद पीएल पुनिया के बेटे हैं। स्थानीय लोगों के साथ जुड़े रहने और सबके सुख-दुख बांटने की तनुज की आदत हर किसी को पसंद आती है।

कौशांबी

भाजपा ने इस सीट पर सांसद विनोद सोनकर पर भरोसा जताया है। वहीं सपा ने 25 वर्षीय पुष्पेंद्र सरोज को मैदान में उतारा है। लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी से अकाउंटिंग और मैनेजमेंट की पढ़ाई करने वाले पुष्पेंद्र के पिता इंद्रजीत सरोज पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और पासी समुदाय में अच्छी पैठ रखते हैं।

प्रमुख चुनौतियां

नए और युवा उम्मीदवार अपने प्रचार अभियान के दौरान युवा मुद्दों को तरजीह दे रहे हैं जिसका सीधा प्रभाव युवाओं पर पर रहा है। विशेष रूप से, बेरोज़गारी और रोज़गार के प्रति सरकार के उपेक्षा पूर्व रवैये पर घेरना युवा वर्ग को प्रभावित कर रहा है। घर-घर जाकर लोगों से संपर्क करना भी मतदाताओं को प्रभावित कर रहा है।

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